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  Click to download अखिल भारतवर्षीय जैसवाल जैन महासभा का संशोधित संविधान एवं पूर्व कार्यकारिणी समिति विवरण (1936 से अव तक)    
     
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  अखिल भारतवर्षीय जैसवाल जैन महासभा पारिवारिक विवरण का प्रारूप फार्म (डायरेक्टरी हेतु)

   
 
 
   
   
   
   
   
 
 
 
 
 
 
 
जैसवाल जैन पत्र अप्रैल- मई, 2016 || Directory || सेवा नया शुभारंभ || Annual Function of Jaiswal Jain Sabha Delhi & NCR to be held on 25.12.2016 (Sunday) at Ahimsa Sthala, Mehrauli, New Delhi from 10.30 A.M.
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अखिल भारतवर्षीय जैसवाल जैन महासभा सम्पूर्ण भारतवर्ष एवं विदेशों में निवास कर रहे जैसवाल जैनों (तरौंचिया जैसवाल जैन) का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र संस्था है। यह एक प्रगतिशील, रचनात्मक एवं कर्तव्यनिष्ठा के साथ उत्तदायित्व का निर्वाह करने वाली संस्थाओं में से एक है। आज तरौचिया जैसवाल जैन समाज सामाजिक तथा आर्थिक द़ष्टि से प्रगतिशील समाज की श्रेणी में है। भारतवर्ष में जैनों की जनसंख्या में तरौचिया जैसवाल जैनों की संख्या काफी कम है। हमारे पूर्वजों द्वारा जैसवाल जैन समाज के सुचारू रूप से संगठित होने तथा उनके द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए महासभा की स्थापना की गई।

महासभा का अधिवेशन दिनांक 11-12 अप्रैल 1936 को हाथरस में स्व. श्री लालता प्रसाद जैन, वकील, हाथरस के सभापतित्व में सम्पन्न हुआ। उस समय स्व. मुन्नीलाल जैन (अलीगढ) महामन्त्री तथा स्व. श्री स्व भगवती प्रसाद जैन (अलीगढ) कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुए थे उस समय श्री (पं) इन्द्रमणि जैन (अलीगढ) को जैसवाल जैन पत्र का सम्पादक मनोनीत किया गया था।

आज (सन 2016) जैसवाल जैन पत्र के 97वे वर्ष 1 का अंक निकल रहा है तदनुसार प्रथम अंक सन 1919 में निकला था। तब से आज तक लम्बी यात्रा महासभा ने तय की है। समय समय पर हमारी महासभा के पूर्व अध्यक्षों ने महासभा को सुचारू रूप से चलाने के सभी प्रयत्न किए एवं सफल भी रहे। डॉ. विमल कुमार जैन (दिल्ली), डॉ. राजकमल जैन (मथुरा), पारस कुमार जैन (आगरा), डॉ. धन्यकुमार जैन, (नोयडा) एवं डॉ. राजकमल जैन (मथुरा) आदि पूर्व अध्यक्षों ने हमारी महासभा के गरिमामयी पद के कर्तव्यों को बखूबी निभाया। आज श्री मणीन्द्र जैन इस महत्वपूर्ण गरिमामयी पद को सुशोभित कर रहे हैं।

महासभा के तीन मुख्य उद्देष्य हैं - संगठन, समन्वय व सदभावना

णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोएसव्वसाहूणं

एसो पंच णमोक्कारो
सवव् पावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं
पढमं हवइ मंगलम्

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